Unit -5 जीव और समष्टियां|| जीव विज्ञान 12

 Unit-5  जीव और पर्यावरण

जीव और समष्टियां

जीव(Organism)-. पर्यावरण का प्रत्येक जीवित घटक जीव कहलाता है।

Population (समष्टि)- एक ही प्रजाति के जीवों का समूह समष्टि कहलाता है।

जैव समुदाय(Community)- एक से अधिक प्रजातियों या प्राणियों या जंतुओं और पौधों के समूह को जैव समुदाय कहते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं-

पादप समुदाय

जंतु समुदाय

सूक्ष्म जीव समुदाय

Biom /जीवोम – प्रकृति में अनेक जैविक समुदाय अर्थात पादप समुदाय /,जंतु समुदाय,/ सूक्ष्म जीव समुदाय साथ- साथ रहते हैं। एक ही क्षेत्र की समान जलवायु में निवास करने वाले जैव समुदाय को बायोम कहते हैं।

 जीवमंडल- पृथ्वी पर फैले हुए वृहत भूमंडल की सीमा जहां तक पारिस्थितिकी तंत्र संचालित होता है जीवमंडल कहलाता है।

Ecology (पारिस्थितिकी)- जीव तथा उसके पर्यावरण का संबंध पारिस्थितिकी कहलाता है। इस शब्द का प्रतिपादन सर्वप्रथम 1868 ई0 में रेटर ने किया था।

अर्नेस्ट हैकल के अनुसार-

सजीवों के कार्बनिक तथा अकार्बनिक वातावरणीय तथा पारस्परिक संबंधों का अध्ययन इकोलॉजी कहलाता है।

जीव और पर्यावरण- पर्यावरण  दो शब्दों से मिलकर बना है परि + आवरण जिसका शाब्दिक अर्थ है चारों ओर से घिरा हुआ अर्थात वह घेरा जो किसी जैविक व अजैविक घटक को चारों ओर से घेरे रहता है, पर्यावरण कहलाता है। पर्यावरण बहुत से कारकों  से मिलकर बना है। प्रत्येक जीव स्वयं को इसके अनुरूप ढालने में सक्षम होता है।

पर्यावरण के घटक- पर्यावरण के अंतर्गत 3 मुख्य तत्व जल, थल, वायु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है यह निम्न है-

Atmosphere वायु मंडल- पृथ्वी के चारों ओर पाया जाने वाला कैसी आवरण हुआ मंडल कहलाता है यह गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित रहता है इसमें 78% नाइट्रोजन, 0.04 % कार्बन डाइऑक्साइड, 20.95 % ऑक्सीजन, तथा 0.93 % आर्गन गैस होती है।

वायुमंडल में निम्न परते पाई जाती है-

क्षोभमण्डल(ट्रोपोस्फीयर), समतापमण्डल(स्ट्रैटोस्फियर), मध्यमण्डल(मेसोस्फीयर), तापमंडल(थर्मोस्फीयर) और बहिर्मंडल(एक्सोस्फीयर)।

जलमंडल-पृथ्वी का लगभग एक तिहाई भाग जल होता है इसी कारण इसे नीला ग्रह भी कहते हैं। इसके अंतर्गत महासागर ,सागर , झीलें , नहरे ,तालाब ,ग्लेशियर इत्यादि आते हैं। पृथ्वी का लगभग 97 % भाग जल लवणीय होता है जो कि सागरों तथा महासागरों में पाया जाता है तथा शेष 3 % भाग अलवणीय होता है।जो कि पीने योग्य होता है।

स्थलमंडल -पृथ्वी का वह भाग जिस पर पानी नहीं है स्थलमंडल कहलाता है यह मैदानों पर्वतों पठार ओ रेगिस्तान ओ इत्यादि से मिलकर बना होता है पृथ्वी पर 1 / 4 भाग स्थलमंडल है। जहां पर समस्त जीव जंतु निवास करते हैं।

अजैविक घटक -अजैविक घटकों का जीवों की संरचना, कार्यों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।इसके अंतर्गत तापमान, जल प्रकाश, मृदा ,तथा वायु इत्यादि आते हैं।

आवास या निकेत -प्रत्येक जीव का एक निश्चित वास स्थान होता है जहां पर वह निवास करता है आवास कहलाता है। जैविक घटक की तुलना में अजैविक घटकों का जीव के आवास पर प्रत्यक्ष रूप से अधिक प्रभाव पड़ता है।

निकेत लैटिन भाषा का Nidus शब्द है जिसका अर्थ है Nest अर्थात घोसला।

इससे सर्वप्रथम जय ग्रीनले  ने1917 ई0में दिया था तथा इसे जीव का स्थान कहा।

प्रत्येक जीव जाति विशिष्ट कार्य एवं आवास ग्रहण करती है कार्य, क्रियाशीलता आवास के सम्मिश्रण को ही पारिस्थितिकी निकेत कहते हैं।

हचिंसन के अनुसार-निकेत में जैविक तथा अजैविक घटकों को शामिल किया गया है जिसके लिए कोई जाति विशिष्ट रूप से अनुकूलित होती है।

आडम के अनुसार-आवास किसी जीव के रहने का स्थान अर्थात उसका पता होता है जबकि निकेत उसका व्यवसाय है।

निकेत के प्रकार-

आवासीय या स्थानीय निकेत-यह जीव द्वारा बसने वाला भौतिक स्थान को प्रदर्शित करता है।

आहारी या पोषणीय निकेत-यह पारितंत्र में जीव की कर्म स्थिति को प्रदर्शित करता है इसमें 2 जातियां एक ही आवास में रह सकती हैं परंतु उनके भोजन या स्वाद में भिन्नता पाई जाती है।

जीवन स्वरूपनिकेत -इस प्रकार के निकेत में भिन्न प्रकार के शारीरिक संगठन वाले पौधे उत्तम प्रकार से साथ-साथ रहते हैं जैसे वृक्ष एवं झाड़ियां।

Note-सूर्य से आने वाली पराबैंगनी या हानिकारक किरणों से त्वचा का कैंसर आंखों का मोतियाबिंद इत्यादि रोग हो जाते हैं।

यूरिथर्मल- ऐसे जीवधारी जिन पर तापमान के उतार-चढ़ाव का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है यूरिथर्मल कहलाते हैं जैसे स्तनधारी।

सहोपकारिता-यह दो भिन्न प्रजातियों के जीवो के मध्य पाया जाने वाला सहजीवी संबंध होता है जिसमें दोनों जीवो को लाभ होता है ।जैसे -लाइकेन में कवक तथा शैवाल का पारस्परिक संबंध जिसमें शैवाल, कवक को भोजन उपलब्ध कराता है जबकि कवक इसके बदले जल तथा खनिज लवण देता है।

प्रतिस्पर्धा-दो या दो से अधिक सदस्यों के बीच स्थान ,जल ,ऊर्जा ,रोटी,कपड़ा ,मकान के लिए स्पर्धा होती है यह एक ऐसी क्रिया है जो दो या दो से अधिक जीवो के मध्य संसाधनों की उपलब्धता हेतु होती है।

स्पर्धा दो प्रकार की होती है

अंतः जातीय स्पर्धा-यह स्पर्धा एक ही जाति के सदस्यों के मध्य में होती हैं ।एक ही जाति के सदस्यों की आवश्यकताएं समान होती है इसलिए इनमें प्रतिस्पर्धा अधिक होती है।

अंतरजातीय स्पर्धा-यह स्पर्धा भिन्न-भिन्न जातियों के सदस्यों के मध्य में होती है पारितंत्र में पादप तथा जंतु एक साथ रहते हैं इनके मध्य स्पर्धा अनेक प्रकार से होती है। जैसे-पादपों के समुदाय में विभिन्न जातियों में आवास, आहार, जल, प्रकाश ,पोषक तत्व आदमी स्पर्धा तथा जंतुओं के बीच परभक्ष्य तथा भक्ष्य स्पर्धा।

परभक्षण-इसमें एक जंतु दूसरे जंतु को मारकर खा जाता है वह जंतु जो मार रहा है यह शिकार कर रहा है वह शिकारी या परभक्षी कहलाता है, जबकि वह जीव जिसका शिकार किया जाता है या जिसे खाया जाता है भक्ष्य या शिकार कहलाता है, इस प्रकार के संबंध में शिकारी को लाभ होता है तथा शिकार को हानि होती है।

जैसे -शाकाहारी जंतु हरे पादपों बीजो फलों आदि को खा कर नष्ट कर देते हैं।

कुछ कीटभक्षी पौधे पादप नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए कीटों का भक्षण करते हैं जैसे ड्रोसेला यूट्रीकुलेरिया नेपेंथेस ,विनस फ्लाई ,।

पर जीविता -यह विषमपोषी जीव होते हैं जो अपने पोषद के शरीर से भोजन प्राप्त करते हैं ।जब दो जातियों के बीच पारस्परिक संबंध हो तो जिसमें एक जाति को लाभ होता है तथा दूसरे को हानि हो तो उसे पर जीविता कहते हैं।जैसे- खटमल, जूं और मनुष्य।

समष्टि के गुण या विशेषताएं-समस्त के गुण या विशेषताएं निम्न वत है-

Birth rate जन्म दर-किसी निश्चित समय में जन्म लेने वाले नए जीवों की संख्या जन्म दर कहलाती है।


मृत्यु दर-किसी निश्चित समय में मरने वाले जिलों की संख्या मृत्यु दर कहलाती हैं।


जैव सूचकांक-किसी भी समष्टि में एक निश्चित समय में जन्म दर तथा मृत्यु दर के अनुपात को जैव सूचकांक कहते हैं।

जैव सूचकांक=जन्म दर/मृत्यु दर ×100

समष्टि घनत्व-किसी निश्चित समय पर इकाई स्थान पर उपस्थित एक ही जाति के कुल सदस्यों को समष्टि घनत्व कहते हैं। इसे D से निरूपित करते हैं।

D=N/S

जहां N=जीवों की कुल संख्या 

S= इकाई स्थान

लिंगानुपात -किसी समष्टि में नर तथा मादा का अनुपात लिंग अनुपात कहलाता है।जैसे-2000 11 की जनगणना के अनुसार भारत में लिंगानुपात निम्न था-1000:940

प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या लिंगानुपात कहलाती है।

Age structure आयु संरचना- किसी समष्टि में उपस्थित जीवों या व्यक्तियों के आयु वर्गों का प्रतिशत आयु संरचना कहलाता  है।इसे तीन वर्गों में बांटा गया है-

जनन पूर्व आयु

जनन योग्य आयु

जनन  पश्च आयु

पारिस्थितिकी अनुकूलन-पारिस्थितिकी अनुकूलन किसी जीवधारी के बाह्य या आंतरिक लक्षणों से है, जिसमें किसी विशेष वातावरण में रहने, वृद्धि ,भोजन ,प्रजनन इत्यादि के लिए पूर्णतः सक्षम बना पाते हैं।

अथवा

अनुकूलन वह अवस्था है जिससे जीव अपने आप को  प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने के लिए अपनाते हैं।

अथवा

सजीवों का पर्यावरण के बदलाव के अनुसार स्वयं को उसके अनुकूल बनाने की प्रक्रिया पारिस्थितिकी अनुकूलन कहलाती है यह निम्न प्रकार के होते हैं-

मरूदभिद या शुष्कोदभिद – ऐसी वनस्पतियां जो कि शुष्क स्थानों पर या रेगिस्तान में या मरुस्थल में पाई जाती है मरूदभिद कहलाती है ।यहां जल का अभाव होता है। इनमें निम्न प्रकार का अनुकूलन पाया जाता है-

आकारिकी अनुकूलन-यह निम्न प्रकार का होता है-

इनकी जड़ें अत्यंत लंबी एवं विकसित हो जाती हैं।

इनके तने मोटी छाल वाले एवं काष्ठीय  होते हैं।

इनकी पत्तियां कांटो में रूपांतरित हो जाती है जिससे वाष्पोत्सर्जन के दर कम हो जाती है।

इनकी पत्तियां बहुत छोटी होती है तथा उन पर रंध्र बहुत ही कम होते हैं।

कुछ पौधों की पत्तियां अत्यंत चमकदार व चिकनी होती है जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर देती है।

शारीरिकी अनुकूलन-इनमें शारीरिकी अनुकूलन निम्न होता है-

जड़ों पर मूल रोम या मूल गोप विकसित होता है।

पत्तियों में रंध्र धंसे हुए होते हैं।

इनमें संवहन तथा यांत्रिक ऊतक अत्यंत विकसित होते हैं।

कुछ पौधों में जल संग्रहण ऊतक पाए जाते हैं जो जल का संग्रह कर लेते हैं।

जलोदभिद-यह पौधे जलीय वातावरण में पाए जाते हैं तथा जल  निमग्नी या प्लवी कहलाते हैं। इनमें निम्न प्रकार का अनुकूलन पाया जाता है-

आकारिकी अनुकूलन-इनमें निम्न प्रकार का अनुकूलन पाया जाता है –

यह जल की प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं इसलिए इनकी जड़े कम विकसित होती हैं।

इन में प्रकाश संश्लेषी/स्वांगीकारक  जड़े पाई जाती हैं।जैसे- सिंघाणा 

इनके तने हल्के एवं शाकीय होते हैं।

इनकी पत्तियों पर मोम की परत पाई जाती है जिससे यह जल में सड़ने नहीं पाती है।

शारीरिकी अनुकूलन- इनमें निम्न प्रकार का शारीरिकी अनुकूलन पाया जाता है-

इनमें उप त्वचा का अभाव होता है।

जल में डूबे हुए पौधों की पत्तियों पर रंध्र नहीं पाए जाते हैं जबकि प्लावी पौधों में पाए जाते हैं।

इनमें यांत्रिक ऊतक अल्प विकसित होते हैं।

इनमें संवहन बंडल अविकसित होते हैं।

लवणो भिद -ऐसे पादप जो लवणीय मृदा में उगते हैं या पाए जाते हैं लवणोंदभिद पादप कहलाते हैं ।इस प्रकार की मृदा में लवणों की सांद्रता बहुत अधिक होती है जिसके कारण इसका परासरण दाब बहुत उच्च होता है। इनमें निम्न अनुकूलन पाया जाता है-

आकारिकी अनुकूलन- इनमें निम्न प्रकार का आकारिकी अनुकूलन होता है-

इनमें श्वसन मूल पाए जाते हैं।

इनका तना मोटा एवं मांसल होता है।

तनो पर मोटा आवरण होता है।

इनमें   पितृस्थ अंकुरण पाया जाता है।

इनकी जड़े ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती गति करती हैं।

शारीरिकी अनुकूलन-इनमें शरीर की अनुकूलन निम्न होता है-

पत्तियों कि दोनों सतहों पर उपत्वचा का मोटा आवरण पाया जाता है।

वल्कुट में H आकृति पाई जाती हैं जो यांत्रिक दृढ़ता प्रदान करती हैं।

इसमें  भूमिगत जड़ों पर बहु स्तरीय कार्क पाई जाती है।

रंध्र प्रायः निचली सतह पर पाए जाते हैं।

जंतुओं में अनुकूलन-समस्त जीव जंतु स्वयं को वातावरणीय दशाओं के अनुसार ढालने में सक्षम होते हैं। विभिन्न प्रकार के जीवों में वातावरणीय अनुकूलन भिन्न- भिन्न होता है-

जलीय जीवो में अनुकूलन-ऐसे जंतु जो जल में पाए जाते हैं या निवास करते हैं जलीय जीव कहलाते हैं। इनमें निम्न प्रकार का अनुकूलन पाया जाता है-

इनका शरीर नौका कार हो जाता है जो उन्हें तैरने में सहायता करता है।

इनके शरीर पर बाह्य कंकाल पाया जाता है।

यह प्रायः गलफड़ों  द्वारा श्वसन करते हैं।

इनमें चलन अंग पंख या  फिन पाए जाते हैं।

इनके शरीर पर वायु थैली पाई जाती है जो कि जल दाब को नियंत्रित करती है।

मरुस्थलीय जंतुओं में अनुकूलन-मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंतुओं को मरुस्थलीय जंतु कहते हैं। इनमें निम्न प्रकार का अनुकूलन पाया जाता है-

यह जीव जल की पूर्ति अपनी आंतरिक वसा के ऑक्सीकरण से करते हैं।

यह जीव ग्रीष्म निष्क्रियता को अपनाते हैं।

कुछ जीव मूत्र को सांद्रित कर उसके उत्सर्जन से होने वाली जल की हानि को पूरा करते हैं।

सह भोजिता- यह एक ऐसी पारस्परिक क्रिया है जिसमें एक जाति को लाभ होता है तथा दूसरे को न  हानि न लाभ होता है। जैसे- बगुला तथा चारण पशु ।



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