यौन संचारित रोग , जनन स्वास्थ्य

 Sexually Transmitted Disease यौन संचारित रोग/STD रोग – ऐसे रोग जो लैंगिक संसर्ग के समय यौन संबंध  द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संचारित होते हैं यौन संचारित रोग कहलाते हैं। इन्हें रजित रोग Veneral diseases  भी कहते  हैं। यह रोग एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन संबंध रखने पर अधिक फैलते हैं यह रोग निम्नलिखित हैं –

.Syphilis उपदंश

Gonorrhoea सूजाक

AIDS

Genital Warts जननांगों के मस्से

Genital Herpes जननांगों का हर्पीज रोग

Hepatitis यकृतशोध / हिपेटाइटिस

1- Syphilis उपदंश -यह रोग ट्रिपोनेमा पैलिडम नामक जीवाणु के द्वारा फैलता है।

Symptoms लक्षण – इसका प्रमुख माध्यम बाह्य जननांगों में घाव, रोम पुटिकाएं या खरोच आदि हैं। इसमें सर्वप्रथम संक्रमित स्थान पर एक बैंगनी वृत्ताकार घाव बन जाता है शरीर के ग्रसनी, मलाशय तथा होठों की श्लेष्मिका में भी ऐसा संक्रमण हो सकता है। इसमें पेनिस तथा योनि के पास लाल रंग के दाने निकल आते हैं । इसका उद्भवन काल लगभग तीन सप्ताह होता इसके अधिक संक्रमण पर लकवा, पागलपन ,व्यापक रुधिर स्राव इत्यादि हो सकते हैं ।गर्भवती महिलाओं में भ्रूण के लिए  यह रोग घातक सिद्ध हो सकता है।

उपचार - इसका उपचार पेंसिलिन एवं टेट्रासाइक्लिन नामक प्रतिजैविक द्वारा किया जाता है।

2-Gonorrhoea सूजाक -यह रोग निसेरिया गोनोरी नामक जीवाणु द्वारा फैलता है।

Symptoms लक्षण – इस रोग का संक्रमण स्त्रियों एवं पुरुषों के मूत्र मार्ग में होता है। स्त्रियां इस रोग की वाहक होती है।   इससे संक्रमित व्यक्ति को मूत्र त्याग के समय मूत्र मार्ग में जलन होती है तथा सूजन भी आ जाती है। जबकि महिलाएं बांझपन का शिकार हो जाती हैं।

उपचार- इसका उपचार भी पेंसिलिन के द्वारा किया जाता है।

3-Genital warts जननांगों के मस्से -यह रोग मानव पेपिलोमा विषाणु के द्वारा फैलता है।

Symptoms लक्षण -  इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों में जननांगों पर मस्से निकल आते हैजो बाद में कैंसर में परिवर्तित हो जाते हैं।

उपचार-  इसका उपचार laser surgery(लेजर सर्जरी) या अल्फा – इंटरफेरोन नामक दवाई से किया जाता है।

4-Genital Herpes जननांगों का हर्पिज रोग- यह विषाणु जनित रोग है जोकि हर्पीज सिंपलेक्स विषाणु -II के द्वारा होता है।

Symptoms लक्षण - इस रोग से ग्रसित व्यक्ति में जननांगों में सूजन, पीड़ा, घाव, योनि एवं मूत्र  मार्ग से पानी निकलने लगता है।

उपचार- इससे ग्रसित व्यक्ति का कोई निश्चित उपचार नहीं होता है रोगी को एसाइक्लोविर नामक दवा दी जाती है तथा संभोग के प्रति संयम रखने की सलाह दी जाती है।

Hepatitis या यकृतशोध- यह रोग यकृत में विषाणु के संक्रमण द्वारा फैलता है इसलिए इसे यकृत शोध भी कहते हैं। यह रोग हेपेटाइटिस बी द्वारा होता है ।

Symptoms लक्षण – इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के यकृत में सूजन आ जाती है पहले फ्लू, मितली ,भूख की कमी पेट में दर्द, थकान, तथा त्वचा एवं आंखें पीली  (Jaundice)हो जाती हैं तथा मूत्र  पीला आने लगता है।यह वायरस AIDS की तुलना में 100 गुना अधिक संक्रमणकारी होता है।

उपचार- इस रोग के उपचार के लिए प्रतिरक्षी वैक्सीन HBB को  तैयार कर लिया गया है। इसके अतिरिक्त इससे ग्रसित व्यक्ति को स्वच्छ वातावरण पूर्ण आराम तथा स्वच्छ आहार ग्रहण करना चाहिए।

AIDS (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)- यह रोग ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस  (HIV)के द्वारा फैलता है।

रोग फैलने के कारण - यह रोग असुरक्षित लैंगिक संसर्ग के कारण रक्तधान में अनियमितता, नशीले पदार्थों का अधिक सेवन के द्वारा फैलते हैं।  इसका उद्भव काल 9-30 माह होता है।

Symptoms लक्षण - इसमें रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है और रोगी का शरीर जगह-जगह फूल जाता है क्योंकि में खून का संचार अव्यवस्थित हो जाता है और अंततः रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति में प्रारंभ में हल्का ज्वर, सिर वा बदन में दर्द, फोड़े फुंसियां घबराहट आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

जब व्यक्ति पूर्ण रूप से ग्रसित हो जाता है तो इसमें न्यूमोनिया अंधापन, पागलपन, चेहरे पर दाने, अतिसार, भूख की कमी ,कमजोरी थकावट ,शरीर में दर्द, सूखी खांसी, मुख और आंत में घाव, तथा जननांगों एवं गुदा पर मस्से आदि निकल आते हैं

उपचार- एड्स की जांच एलिसा  (Enzyme linked Immuno sorbent assay kit )के द्वारा की जाती है प्रतिवर्ष 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है।

इससे ग्रसित व्यक्ति को सुरामीन, साइक्लोस्पोरीन,अल्फा इंटरफेरोन ,इत्यादि दवाई देनी चाहिए जो की HIV ke संक्रमण को रोक देती हैं।

Infertility बंध्यता - विश्व में अनेकों दंपत्ति अपनी संतान उत्पन्न नहीं कर पाते हैं और संतान के सुख से वंचित रहते हैं इसे बांझपन कहते हैं। ऐसे व्यक्ति ल समाज में लगभग 2 से 10% तक  होते हैं।

यह नर तथा मादा किसी में भी हो सकता है ।पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम होने पर भी बांझपन होता है जबकि मादाओं में  अनियमित अंडोत्सर्ग,जनन पथ में अवरोध, अंडवाहिनी में संरचनात्मक त्रुटि,तथा भ्रूण रोपण में बाधा आदि होने पर बांझपन होता है।

Assisted Reproductive techniques सहायक जनन विधियां – आधुनिक वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसी तकनीकी विधियों का आविष्कार किया है जिसके प्रयोग से बांझ दंपति भी संतानोत्पत्ति कर सकते हैं ऐसी तकनीकी को सहायक जनन प्रौद्योगिकी कहते हैं ।कुछ सहायक जनन तकनीकि निम्नवत हैं –

IVF – In vitro Fertilization अंतः पात्रे निषेचन- इस तकनीक में शरीर से बाहर लगभग शरीर के भीतर जैसी स्थितियों में संवर्धन के माध्यम से स्त्री के अंडे का नर के शुक्राणु से निषेचन कराया जाता है तत्पश्चात बने Zygote में कोशिका विभाजन शुरू होने पर भ्रूण को female के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है जहां बेबी का विकास होता है इसे टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं।

परखनली शिशु की उत्पत्ति सर्वप्रथम इटली के वैज्ञानिक डॉक्टर पेट्रूसी ने 1959 में किया था।

भारत में प्रथम परखनली शिशु का जन्म 3 अक्टूबर 1978 में कोलकाता में हुआ था जिसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल रखा गया।

आईवीएफ (IVF) दो प्रकार से किया जाता है-

1- ZIFT – Zygote  Intra Fallopian transfer युग्मनज अंतःअंडवाहिनी स्थानांतरण-  प्रयोगशाला में निषेचित किए गए जायगोट को 24 घंटे के पश्चात युग्मनज को फैलोपियन ट्यूब में स्थानांतरित करते हैं तो उसे युग्मनज का अंतः फैलोपियन स्थानांतरण कहते हैं इस विधि को सर्वप्रथम डेवराय एटल (1986) ने विकसित किया था।

2- Intra uterine transfer/IUT- जब 32-कोशिकीय भ्रूण को स्त्री के गर्भाशय में स्थानांतरित करते हैं तो उसे अंतः गर्भाशयी स्थानांतरण कहते है।।

Gamete Intra fallopian transfer /GIFT युग्मक अंतः अंड वाहिनी स्थानांतरण - जब स्त्री के गर्भ धारण की समस्या हो तो फैलोपियन नलिका से भ्रूण को प्राप्त कर अन्य सामान्य स्त्री के फैलोपियन नलिका में पहुंचाया जाता है जहां अंडे के निषेचन के पश्चात भ्रूण का विकास होता  है।इसे युग्मक अंतः अंड स्थानांतरण कहते हैं।

Intra cytoplasmic sperm injection/ICSI - अंतः कोशिका द्रवीय शुक्राणु निक्षेपण में sperm को सीधे ovum के अंदर इंजेक्ट किया जाता है।

Artificial  Insemination techniques/AIT - दाता के शुक्राणु को मादा की योनि या गर्भाशय में कृत्रिम विधि या इंजेक्शन के द्वारा पहुंचाते हैं तो उसे कृत्रिम वीर्य सेचन कहते हैं।





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