मानव कल्याण में सूक्ष्म जीव

सूक्ष्म जीव – ऐसे जीव जिन्हें हम अपनी नग्न आंखों से नहीं देख सकते सूक्ष्म जीव कहलाते हैं। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। यह सर्वव्यापी होते हैं।
घरेलू उत्पादों में सूक्ष्म जीव - प्रारंभ से ही सूक्ष्म जीवों का घरेलू उत्पादों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है जो कि निम्न है-
दही बनाने में - दूध से दही बनाने के लिए लैक्टोबैसिलस जीवाणु प्रमुख भूमिका निभाता है। यह दूध में पाई जाने वाली केसीन नामक प्रोटीन को दही में रूपांतरित कर देता है।
पनीर बनाने में- दूध का लैक्टिक अम्ल से किण्वन कराने पर पनीर का निर्माण होता है।इसका निर्माण लैक्टोबैसिलस लैक्टिस जीवाणु तथा पेनिसिलियम कोममबर्टी एवं राक्यूफॉर्टी नामक कवकों से होता है।
ब्रेड बनाने में – सूक्ष्म जीवो का प्रयोग ब्रेड तथा डबल रोटी बनाने में किया जाता है। इसके लिए गेहूं के आटे में सेकरो माइसीज सेरेवैसी कवक को मिलाया जाता है।
इडली डोसा बनाने में- इडली ,डोसा बनाने में दाल व चावल के आटे को किंडवन किया जाता है इसके लिए ल्यूको नास्टाक तथा स्ट्रैप्टॉकोकस फीकेलिस जीवाणुओं का उपयोग किया जाता है।
सोयाबीन बनाने में – सोयाबीन को किंडवित कर अनेक उत्पाद बनाए जाते हैं जैसे- टेंपेह, सोफू,टोफू इत्यादि।
टोडी के निर्माण में – यह एक प्रकार का दक्षिण भारतीय का पारस्परिक पेय पदार्थ होता है। इसमें ताड़ के शीर्ष भाग को काटकर एक स्राव प्राप्त किया जाता है जिसे किंडवित कर पीने योग्य बना लिया जाता है।
अचार एवं सब्जियों को परीरक्षित करने में -विभिन्न प्रकार के फलों को काटकर उन्हें परिरक्षित कर लिया जाता है तथा सूक्ष्मजीव जैसे लैक्टोबैसिलस,म्यूकर, स्पर्जिलस, स्ट्रेप्टोकोकस, किंडवन विधि के द्वारा अचार प्राप्त कर लिया जाता है।जिनका प्रयोग हम एक लंबे समय तक करते रहते हैं।
औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव- विभिन्न सूक्ष्म जीवों का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। जिसके लिए बड़े-बड़े बर्तनों की आवश्यकता होती है जिसे किंडवक या फर्मेटर कहते हैं। इनके द्वारा प्रतिजैविक, अल्कोहल, कार्बनिक अम्ल तथा एंजाइम्स का उत्पादन किया जाता है।
• एसिटिक अम्ल का निर्माण- जब शर्करा के घोल में एथिल अल्कोहल एसिटोबैक्टर एसिटी को मिलाकर किंडवन कराया जाता है तो एसिटिक अम्ल का निर्माण होता है।
• साइट्रिक अम्ल का निर्माण- शर्करा के घोल को फफूंद द्वारा किंडवन कराने पर साइट्रिक अम्ल प्राप्त होता है।
• किंडवित पेय पदार्थ में- सूक्ष्म जीवों का प्रयोग किंडवित पर पदार्थों जैसे वाइन, व्हिस्की बियर इत्यादि बनाने में किया जाता है ।
• ग्लूकॉनिक अम्ल - शर्करा के घोल में इस पर जिला नाइजर के द्वारा किंडवन से ग्लूकॉनिक अम्ल का निर्माण होता है इससे प्राप्त कैल्शियम ग्लूकोनेट का प्रयोग गाय ज्वर में किया जाता है
• प्रतिजैविक के निर्माण में- विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीवों के द्वारा प्रतिजैविक औषधि ओं जैसे पेंसिलीन इत्यादि बनाई जाती है।
• एंजाइम संश्लेषण में- सूक्ष्म जीवों के द्वारा विभिन्न प्रकार के एंजाइम जैसे प्रोटिएज, लाइपेज, सेल्यूलोज इत्यादि का निर्माण किया जाता है।
Sewage या वाहित मल -बड़े-बड़े शहरों व कस्बों में घरों से निकला मनुष्यों का मल वा नालियों में बहता गंदा पानी सीवेज कहलाता है।
वाहित मल उपचार में सूक्ष्म जीव- वाहित मल को किसी भी जल स्रोत में डालना हानिकारक होता है क्योंकि इसमें कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है तथा इसमें रोग या रोगाणु अत्यधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इनसे हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग जैसे- हैजा, टाइफाइड, पेचिश इत्यादि उत्पन्न हो जाते हैं।
वाहित मल को उपचारित करने के लिए बड़े-बड़े शहरों में वाहित मल संयंत्र लगाए जाते हैं जो कि पानी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए काम आते हैं वाहित मल उपचार के लिए निम्न तीन चरण होते हैं-
• प्राथमिक उपचार या भौतिक उपचार- इसे भौतिक उपचार भी कहते हैं इसके अंतर्गत छोटे-बड़े कणों को अवसादन तथा निस्यंदन द्वारा पृथक कर दिया जाता है। इसमें बारीक प्राथमिक स्लज के रूप में नीचे आ जाते हैं तथा प्लावी बहिः स्रावित हो जाते हैं।
• द्वितीयक उपचार -प्लवी बहि स्त्राव को वायु युक्त टैंकों में पहुंचाकर निरंतर हिलाया जाता है। इसमें वायु प्रवाहित की जाती है।इसके फलस्वरूप सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि तेजी से होने लगती है तथा ये कार्बनिक पदार्थों का विघटन कर देते हैं फलतः जल को निःसाधन टैंक में भेज दिया जाता है जिनसे इसमें उपस्थित बैक्टीरिया तथा कवक नीचे बैठ जाते हैं ।यह बायोलॉजिकल उपचार होता है।
• तृतीयक उपचार-द्वितीयक उपचार के पश्चात प्राप्त मल जल को क्लोरीन से उपचारित कर लिया जाता है तथा उसे जल स्रोतों में छोड़ दिया जाता है।
• बायोगैस Biogass – यह गैसों का एक ऐसा समूह है जिसमें मुख्यता मीथेन 50-70%, ऑक्सीजन 30-40%, तथा नाइट्रोजन5-10% तक होती है। साधारणतया इसे हम गोबर गैस के नाम से जानते हैं।
Bio Gass Plant - इसमें एक बड़ा टैंक का या सिलेंडर होता है जो कि 10 से 15 फीट गहरा होता है इसका 3/4 भाग भूमिगत होता है इसके ऊपर एक सचल ढक्कन रखते हैं। इसमें कृषि के व्यर्थ पदार्थों एवं अपशिष्ट व संग्रहित गोबर की कर्दम अवायुवीय निम्नीकरण हेतु भरी जाती है। इसमें एक निकास द्वार भी होता है जिसका संबंध एक 2.5 cm रबड़ या लोहे के पाइप से होता है।यह पाइप उत्पादित गैस की आपूर्ति के लिए होता है। इसमें 30 सेंटीमीटर लंबा एक दूसरा निकास द्वार होता है जिससे समय-समय पर कर्दम को बाहर निकाला जाता है जिसका प्रयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है।
उपयोग-इसके निम्न उपयोग हैं
• भोजन पकाने में।
• प्रकाश के रूप में।
• उर्वरक निर्माण में।
जैव नियंत्रक कारक के रूप में सूक्ष्म जीव- कृषि उत्पादन को बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग तथा फसलों को रोगों व पीडिको से बचाने के लिए विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीवों का उपयोग किया जाता है यह विषय तथा जैव अपघटनी होते हैं।
पीड़कनाशी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
• जैव शाकनाशी- ऐसे पदार्थ जो खरपतवार ओं की वृद्धि को कम या नियंत्रित कर देते हैं जैव शाकनाशी कहलाते हैं। जैसे-फाइटोप्थोरा, कैक्टोरम इत्यादि।
• जैव कीटनाशी-ऐसे पदार्थ या जैविक उत्पाद जो कीटों को नष्ट कर देते हैं या उनकी वृद्धि को नियंत्रित कर देते हैं जैव कीटनाशक कहलाते हैं। यह निम्न प्रकार के होते हैं-
• परभक्षी जीव- ऐसे जीव जो पीड़ितों को नष्ट कर देते हैं तथा यह प्राकृतिक होते हैं पर बच्चे जीव कहलाते हैं जैसे उबर मक्खी के लारवा ,पौधे के एफिड्स को खाकर नष्ट कर देते हैं।
• जंतु परजीवी तथा रोग वाहक-ऐसे गीत जो स्वयं परजीवी यों के द्वारा नष्ट हो जाते हैं जंतु परजीवी कहलाते हैं। जैसे गन्ने के तने बेधडक किलोइंडिकस ट्राईकोग्रासा , ऑस्ट्रेलिकन नामक परजीवी नष्ट कर देता है।
• प्राकृतिक कीटनाशी -ऐसे कीटनाशक कवक जो पौधों से प्राप्त किए जाते हैं तथा यह हानिकारक नहीं होते हैं तथा इनका अपघटन हो सकता है प्राकृतिक कीटनाशक कहलाते हैं। जैसे बेसिलस थ्यूरेजिनेसिस से प्राप्त होने वाला कीटनाशक पदार्थ।
• जैविक खाद- ऐसे पोषक पदार्थ जो जीवित प्राणियों से प्राप्त होते हैं तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं जैविक खाद कहलाते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं-
• हरी खाद-ऐसी खाद जिसकी बुवाई कर के खेत में ही पलटाई कर दी जाती है जिसके कारण मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो जाती है, हरी खाद कहलाती जैसे- सनई, ढैंचा,मसूर,बरसीम इत्यादि।
• जैव उर्वरक- ऐसे जीवधारी जो अपने जैविक क्रियाओं के द्वारा मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि कर देते हैं जैव उर्वरक कहलाते हैं।
• राइजोबियम जीवाणु-यह एक प्रकार का सहजीवी जीवाणु होता है जोकि दलहनी फसलों के पौधों की जड़ों में पाया जाता है।
• मुक्त जीवी या स्वतंत्र जीवी जीवाणु-ऐसे जीवाणु जो मृदा में स्वतंत्र रूप में पाए जाते हैं तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक होते हैं मुक्त जीबी कहलाते हैं जैसे नाइट्रोसोमोनास, एसीटोबेक्टर , नाइट्रोबैक्टर इत्यादि।
• मायकोराइजा- यह एक सहजीवी कवक होता है जिसमें कवक मृदा से जल व खनिज लवण को अवशोषित करते हैं तथा इसके बदले पौधों से इन्हें भोजन प्राप्त होता है जैसे आर्किड।